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चतुर बुढ़िया की कहानी : Hindi Kahaniya Web

एक समय की बात है | विसापूर गांव में रामेश्वर नाम का एक शिक्षक था | वह आसपास के गांव के बच्चो को पढ़ाकर उनके द्वारा दिए गए पैसो से अपना जीवन व्यतीत करता था | एक साल बाद उन पैसो में से कुछ पैसे बचने के बाद रामेश्वर ने उस धन को सुरक्षित जगह पर छुपाने के बाद काशी यात्रा पर जाने का सोचा | उसे लगता था की उसके घर में पैसे छुपाना सुरक्षित नहीं है | इसलिए वह सोनार के पास गया |

सोनार उसी गांव में सोने का व्यापारी था | वह उसके पास गया और कहा “सेठजी में काशी जा रहा हु, मेरे पास हजार सोने के सिक्के है, में तुम्हारे घर उन्हें सुरक्षित रखना चाहता हु, क्या तुम रख सकोगे | तब सोनार सेठ बोला “रामेश्वर पैसा बहुत बुरी चीज है, दुश्मनी के लिए यही कारन बनता है, इसलिए में तुम्हारे पैसो की रक्षा नहीं कर पाउँगा, मुझे माफ़ करो” | सोनार ने ये बात रामेश्वर बड़ी गंभीरता से कही |

उसी समय एक व्यक्ति सोनार के पास आया और उसने उसकी दुकान से कुछ गहने ख़रीदे, सोनार के नौकर ने उसे सोना दिया और उसने उसको पैसे दिए | यह देखकर सोनार ने उसके नौकर से पूछा “तुमने उस गहने के बदले उस व्यक्ति से कितने पैसे लिए” | सोनार का नौकर बोला “मालिक मैंने दस सोने के सिक्के लिए” | सोनार ने कहा “लेकिन हमें सिर्फ आठ ही सिक्के लेने है, आठ सिक्के में से हमें एक सिक्के का फायदा होता है, फिर भी तुमने दस सिक्के ले लिए, ये व्यापार करने का सही तरीका नहीं है, उस व्यक्ति को दो सोने के सिक्के वापस करो, अगली बार ऐसा नहीं करना” |

नौकर ने कहा ठीक है, उसने उस व्यक्ति को बुलाया और उसे दो सिक्के वापस कर दिए | यह देखकर रामेश्वर सोनार के ईमानदारी से बड़ा प्रभावित हुवा | उसने सोनार से कहा “सुनिए सोनार सेठ, मुझे तुमपर पूरा भरोसा है, अगर में अपने धन को तुम्हारे पास रखूँगा, तो मेरा पैसा सुरक्षित रहेगा अब और कुछ कहे बिना इस धन को अपने घर में छुपा दीजिये काशी से आने के बाद में अपने पैसे ले लूंगा” | तब सोनार सेठ बोला “महाशय में ना नहीं कह सकता क्यों की आप मुझसे इतना अनुरोध कर रहे है, तो चलिए एक काम करते है, मेरे घर के पिछवाड़े जावो और जहा चाहो मिट्टी खोदो फिर वहा अपना पैसा दफना दो और जहग की पहचान करने के लिए उसपर कुछ रख दो” |

 यह सुनकर रामेश्वर को बहुत ख़ुशी हुयी और उसने कहा “ठीक है सेठ जैसा तुमने कहा में वैसा ही करूँगा” | ऐसा  कहते हुए रामेश्वर ने सोनार के घर के पिछवाड़े आम के पेड़ के निचे एक गड्डा किया और अपने हजार सोने के सिक्के की गठरी वही गाड़ दी | फिर वह काशी की तीर्थ यात्रा पर निकल गया | कुछ दिनों बाद रामेश्वर व्यंकटपुर में वापस आया | एक दिन रामेश्वर सुबह-सुबह सोनार के घर गया और कहा “सोनार सेठ में जाकर अपना पैसा ले लेता हु” तब सोनार बोला “ठीक है रामेश्वर तुमने जो पैसा मेरे घर के पिछवाड़े में छुपाया है तुम उसे ले सकते हो” |

तब रामेश्वर पिछवाड़े गया आम के पेड़ के निचे खुदाई करना शुरू कर दिया जहा उसने अपने पैसा छुपाया था, लेकिन उसे वहा अपने पैसे नहीं मिले | उसने सोनार से कहा “मेरे सिक्को की गठरी उस जगह पर नहीं है जहा  मैंने उसे छुपाया था | तब सोनार बोला “मैंने आपको पहले ही कहा था  ऐसा कुछ होगा, एक बार फिर से उस जगह के  बारे में सोचे जिस जगह तुमने अपना पैसा छुपाया था उसी जगह खुदाई करे, आपको आपका पैसा मिल जायेगा” | लेकिन रामेश्वर समझ गया था सोनार ने उसे धोका दिया है |

रामेश्वर को दुःख बहुत हुवा और वह घर चला गया | रास्ते में वो एक बूढी महिला के पास गया जिसका नाम था सुलोचना | सुलोचना एक बहुत बुद्धिमान महिला थी और अनुभवी भी थी | रामेश्वर को दुखी देखकर उसने पूछा “तुम इतने दुखी क्यों हो रामेश्वर क्या बात है” | तब रामेश्वर ने कहा “में क्या कहु सुलोचना चाची, पहले तो सोनार सेठ ने पहले मुझसे खुदपर भरोसा करवाया, और अब मुझे धोका दिया उसने मेरे धन को एक चालाख योजना से लूट लिया” | इस तरह रामेश्वर ने बताया की उसके साथ क्या हुवा था | सुलोचना ने उसकी बात बड़ी ध्यान से सुनी और फिर बोली “रामेश्वर चिंता मत करो, हमें धोखेबाजो को धोका देकर जितना है, में उस सोनार सेठ को सबक सिखाऊंगी, और तुम्हे अपने हजार सोने के सिक्के वापस कराउंगी” | इतना कहकर सुलोचना ने अपनी योजना बताई और रामेश्वर को आश्वासन दिया |

अगले दिन सुलोचना अपने योजना के अनुसार सोने से भरी गहने की गठरी लेकर सोनार सेठ के पास गयी | उसने सोनार सेठ से कहा “मुझे तुम्हारी मदत चाहिए, मेरा बेटा काशी में पढ़ रहा है, उसे देखे हुए मुझे काफी समय हो गया है,  में उसे देखना चाहती हु, उसे मिलना चाहती हु, तुम मेरे गहने को अपने घर में कही छुपा दो वो तुम्हारे पास सुरक्षित रहेंगे” | सोनार सेठ ने सुलोचना से कहा की वो अपने सोने की गठरी को पिछवाड़े छुपा दे जैसे की उसने रामेश्वर से कहा था | सुलोचना सोनार सेठ के घर के पिछवाड़े सोने की गठरी दफ़न करने चली गयी | उस वक्त रामेश्वर भी वह आ गया, उसे देखकर सोनार सेठ थोड़ा सा घबरा गया और उसने रामेश्वर से पूछा “क्या हुवा रामेश्वर तुम फिर आ गए” तब रामेश्वर बोला “कुछ नहीं सोनार सेठ पहले मैंने सोचा था की, मैंने अपने हजार सोने के सिक्के को आम के पेड़ के निचे दफ़न किया था, लेकिन पिछले बार मुझे वहा मिले ही नहीं, तब मुझे संदेह हुवा, और मैंने बहुत सोचा और मुझे याद आया की मैंने जामुन के पेड़ के निचे दफ़न किया था” |  

रामेश्वर ने जब ऐसा कहा तब सुलोचना बोली “क्या हुवा रामेश्वर क्या तुम्हारा पैसा गायब हो गया है” | उन दोनों को इस तरह बाते करता देखकर सोनार सेठ को बड़ी चिंता हुयी वो बोला “रामेश्वर तुमने उस दिन अपने हजार सोने के सिक्के की गठरी को ठीक से नहीं खोजा था, तुम्हारे जाने के बाद मैने उसे खोजा और मुझे मिल गया, उसे मैंने संभाल कर रखा है तुम रुको में अभी लेकर आता हु” | ऐसा कहते हुए सोनार सेठ हजार सोने के सिक्के की गठरी लाया और रामेश्वर को दे दिया | फिर सुलोचना बोली “बेटा तुम तो काशी गए थे कुछ दिन पहले, तब रामेश्वर ने कहा “हा में कल ही काशी से आया हु” | सुलोचना ने कहा क्या मेरा बेटा तुम्हे वहा मिला था, कैसा है वो ? तब रामेश्वर बोला “तुम्हारा बेटा मुझे वहा मिला था वो ठीक है उसकी पढ़ाई ख़तम होने वाली है और दो तीन दिन में गांव में वापस आने वाला है |

सुलोचना ने कहा ये तो ख़ुशी की बात है, तब सुलोचना ने सोनार सेठ से कहा “मेरा बेटा अब वापस आने वाला है, इसलिए मझे कशी जाने की कोही जरुरत नहीं, साथ ही गहने रखने की भी आवश्यकता नहीं है” | इतना कहकर सुलोचना और रामेश्वर वहा से चले गए | तब सोनार सेठ को समझ में आया की उस बूढी औरत ने सोने के गठरी के नाम पर एक नाटक किया था, ये कितनी चतुर महिला है |

रामेश्वर ने सुलोचना चाची को धन्यवाद कहा और अपनी गठरी मिलने पर बहुत खुश हुवा |

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