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मेहनत का फल | Mehanat ka Fal Hindi Kahani

एक बार रामपुर गांव में एक बूढ़े ब्रम्हाण दाम्पत्य रामेश्वर और सुलोचना रहते थे | उनके पास एक छोटे से घर के अलवा कोही दूसरी संपत्ति नहीं थी | रामेश्वर बिना किसी इच्छा के आद्यात्मिक जीवन जीता था | वह वेद पढ़ता था और ग्रामीणों से उपहार और पैसे लेकर अपना जीवन व्यतीत कर रहा था | जब वो बूढ़ा हो  गया तो उसने वेद पढ़ना बंद कर दिया | वो उस गांव के हर घर में जाकर भिक्षा मांगने लगा | वो ग्रामीणों से कच्चा चावल लेकर घर आता था | सुलोचना रामेश्वर द्वारा लाये गए चावल से खाना बनाती थी |

उस भोजन के साथ रामेश्वर और सुलोचना दोनों अपनी भूक को संतुष्ट करके जीवन जी रहे थे | बाद में रामेश्वर हर दिन भिक्षा मांगने के लिए जाने में असमर्थ हो गया | एक दिन सुलोचना ने रामेश्वर से कहा “आपकी कोही दूरदर्शिता नहीं है, आपने कभी हमारे भविष्य के बारे में नहीं सोचा यदि आपने हमारे भविष्य के बारे में ध्यान रखा होता तो हम ये परेशानी नहीं झेल रहे होते” |

सुलोचना की बाते सुनकर रामेश्वर बोला “जिस व्यक्ति ने पौधा लगाया है, वो निश्चित रूप से उसमे पानी डालेगा, तुम चिंता न करो ईश्वर हमें समाधान देगा” | रामेश्वर की बाते सुनकर सुलोचना ने कहा, कम से कम आप आपके वेदो की दुहाई मत दिजिये, लोगो का कहना है की इस राज्य का राजा क्रांतिवर्मा बहूत उदार है अगर तुम वहा जाकर उनसे मदत मांगोगे तो वह जरूर कुछ कर सकते है |

पत्नी के कहने पर एक दिन रामेश्वर ने राजा से भेट की और उससे मदत मांगी | राजा ने कहा “कहो ब्राह्मण क्या चाहते हो मैं तुम्हारी इच्छा तुरंत पूरी करूँगा” | रामेश्वर ने कहा “धन्यवाद मेरे प्यारे राजा, आपके पास बेशुमार दौलत है लेकिन में आपसे उस दौलत से कुछ भी नहीं चाहता हु आप अपने द्वारा कमाए धन से मुझे कुछ भी दे दीजिये में उसे ख़ुशी से ले लूंगा | राजा के पास अपार संपत्ति थी |

लेकिन राजा ने उसमे से खुद एक पैसा भी नहीं कमाया था | तो उसे मदत के लिए आये ब्रामण को देने के लिए खुद मजदूरी करके खुद कमाना पड़ेगा यह सोचकर उस राजा ने उस बूढ़े ब्रामण से कहा तुम कल मुझसे आकर मिलो में वादा करता हु मैंने जो कमाया है वही तुम्हे दान में दूंगा |

अगले दिन राजा पुराने कपडे पहनकर मजदूर बनकर कुछ पैसा कमाने के लिए निकल पड़ा | कुछ दूर जाने के बाद उसे एक कुंभार मिला जो बर्तन बना रहा था | राजा ने उससे कहा “सुनो क्या तुम मुझे कुछ काम दे सकते हो तो कुंभार बोला ठीक है “वो देखो मिटटी इसको अच्छी तरह मिलाने के लिए अपने पैरो का उपयोग करके रौंदो, शाम तक ये काम करते रहे तो मैं तुम्हे चार तांबे के सिक्के दूंगा |

राजा ने कहा ठीक है और अपना काम करना शुरू कर दिया | लेकिन राजा मिटटी को अपने पैरो से रौंदने को असमर्थ था, उस काम को करते समय उसके पैर दर्द करने लगे | जब कुंभार ने ये देखा तो कहा “तुम ये काम नहीं कर पा रहे हो “जैसे की मैंने वादा किया था में तुम्हे चार तांबे के सिक्के देता हु, इन सिक्को को लो और जाओ, और काम के लिए मेरे पास कभी मत आना समझे” |

इतना कहकर उसने राजा को वहा से भेज दिया | अगले दिन राजा के कहने पर रामेश्वर महल गया | फिर राजा ने रामेश्वर को चार तांबे के सिक्के दिए, और कहा “यह मेरे मेहनत की कमाई है, ले लीजिये” | तब रामेश्वर बोला ‘यह चार तांबे के सिक्के मेरे लिए दस हजार के बराबर है में इन्हे जरूर ले लूंगा’| तब रामेश्वर ने राजा को आशीर्वाद दिया और चला गया |

सुलोचना बेसबरीसे इंतजार कर रही थी और सोच रही थी की उसका पति राजा से एक किंमती उपहार लाएगा | खाली हात आये रामेश्वर को देखकर सुलोचना ने पूछा “सुनो जी क्या हुवा क्या राजा ने तुम्हें कुछ नहीं दिया” | तब रामेश्वर ने कहा “राजा ने मुझे ये चार तांबे के सिक्के दिए है” |

इतना कहकर उसने वो सिक्के सुलोचना को दे दिए | सिक्के देखकर सुलोचना को गुस्सा आ गया और वह रामेश्वर पर गुस्सा करने लगी और गुस्से में उसने वह सिक्के घर के पिछवाड़े में फेक दिए | शाम हो चुकी थी इसलिए सुबह में उन तांबे के सिक्को को खोजूंगा यह सोचकर रामेश्वर ने खाना खाया और सो गया | अगले दिन रामेश्वर ने सिक्के बहुत खोजे लेकिन उसे तांबे के सिक्के नहीं मिले |

उसे उस जगह पर चार छोटे पौधे मिले, रामेश्वर ने अपने जीवन में उन पौधो को कभी नहीं देखा था | यह चार पौधे अजीब तरह से चमक रहे थे | कुछ ही दिन के बाद वह पौधें बड़े होकर पेड़ में बदल गए | कुछ दिनों बाद उन पेड़ो पर फल आने शुरू हो गए | रामेश्वर और सुलोचना ने उन फलो का स्वाद लेने की सोची और उन्हें पेड़ से तोडा | जब उन्होंने उन कच्चे फलो को काटा तो उनके अंदर मोती निकले, उन्हें तो विश्वास ही नहीं हो रहा था | जब उन्होंने उन मोतियों को जोहोरी को दिखाया तब उस जोहोरी ने कहा की यह मोती बहुत किमती है, और उनको मोतियों के बदले बहुत बड़ी रकम दी |

पेड़ो से रोज फल आने लगे तो उन्होंने उन फलो को गरीब लोगो में दान करना शुरू कर दिया | कुछ दिनों के बाद राजा को भी यह बात पता चली | राजा सोचने लगा की ‘मैने तो इस गरीब ब्राह्मण को सिर्फ चार चांदी के सिक्के दिए थे’ पर इसको इतने कम समय में इतना धन कैसे मिल गया | उसे समझ नहीं आया की ये कैसे हुवा | तब राजा यह सब जानने के लिए अपने मंत्री के साथ रामेश्वर के घर गया, और रामेश्वर से पूछा “आप सब लोगो को दान कर रहे है आपके पास इतना धन कहा से आया” |

तब रामेश्वर ने कहा “राजन मने उस दिन आप के द्वारा दिए गाय उन चार तांबे के सिक्को को खर्च नहीं किया, तब मैंने उन्हें अपने पत्नी को दिया तो वह गुस्सा हुई और उन्हें घर के पिछवाड़े में फेक दिया, आचर्यजनक रूप से चार पौधे उस स्थान पर दिखाई दिए और उनके फलो से मोती निकलने लगे और मेरे पास धन आया ” |

इस बात से राजा को कड़ी मेहनत का मूल्य समझ में आया | तब उस राज्य में सबको समझ में आया कड़ी मेहनत सुनहरे फल देती है |

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